इब्न ए आदम
उत्तर प्रदेश सरकार उन लाशों की तस्वीर सोशल मीडिया पर डालने वालों पर मुक़दमे कर रही थी । दफ़्न हुई लाशों से रामनामी खींच रही थी जिससे लोग कबरें ना देख सके या गिन सके । मुख्यमंत्री के अधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट करके बताया जा रहा था कि तीन साल पहले भी ऐसी ही लाशें गंगा में मिली थी , मतलब यह कोई बड़ी बात नहीं है ।
प्रधानमंत्री ने लाशों पर अफ़सोस नहीं जताया और ना ही कोई बयान दिया । उन्हें चिंता यह थी कि इन लाशों की वजह से और कोरोना में हुई उत्तर प्रदेश में अव्यवस्था की वजह से भाजपा उत्तर प्रदेश में होने वाला चुनाव हार सकती है । वो संघ के शीर्ष नेतृत्व के साथ उत्तर प्रदेश के चुनाव जीतने की रणनीति तैयार कर रहे थे । वो डैमिज कंट्रोल कैसे हो इस पर चर्चा कर रहे थे ।
अब 2-3 दिन से लखनऊ में केंद्रीय पर्यवेक्षक आए हुए थे जो मंत्रियों से और भाजपा के वरिष्ठ नेताओ से मीटिंग करके पता कर रहे थे कि चुनाव जीतने के लिए योगी को हटाना चाहिए या नहीं ।
यह सब प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी खुलेआम निडर होकर कर रहे थे । उन्हें रत्ती भर भी यह डर नहीं था कि उत्तर प्रदेश में ऑक्सिजन ना मिलने की वजह से , बेड ना मिलने की वजह , लाइफ़ सेविंग ड्रग्स ना मिलने की वजह से जिन लोगों ने अपनो को खोया है , उन्हें चुनावी चर्चा पर कैसा महसूस होगा । वो दो हज़ार टीचर जो पंचायत चुनाव में ड्यूटी करने की वजह से मर गए , उनके परिजन क्या सोचेंगे ?? वो लोग जिन्हें चिता तक नसीब हुई , जिन्हें गंगा में बहा दिया गया , जिन्हें गंगा के किनारे दफ़ना दिया गया , उनके परिजन भाजपा की चुनावी चिंता को देखकर कैसा महसूस करेंगे ??
भाजपा की इस संवेदनहीनता का कारण क्या है ?? क्यो उसे लगता है कि वो अर्थव्यवस्था को डुबोकर , संस्थान बेचकर , लोगों को राहत ना देकर , लोगों को दवा , ऑक्सिजन ना देकर भी चुनाव जीत सकती है । क्यों ??

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