सौमित्र रॉय
पिछले साल कोविड से पहले विश्वगुरु, सातवीं बड़ी अर्थव्यवस्था, 5 ट्रिलियन जैसे जुमलों से सिगरेट का धुआं उड़ाते दलाल पत्तलकारों से आज जब देश की माली हालत पूछता हूं तो आंखें चुराने लगते हैं।
बीते दिनों जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने मोदी से हॉटलाइन पर बात की तो यही दलाल गोदी मीडिया के पत्तलकार उछल रहे थे, गोया कोई बड़ी डील हो रही हो। उससे पहले केन्या ने जब भारत को चाय, कॉफ़ी और मूंगफली भेजी तो भी भक्तों की खुशी देखते बनती थी, मानों मोदी को चढ़ावा भेजा गया हो।
मेरे एक मित्र बात-बेबात भारत की इकॉनमी की तुलना सब सहारा अफ्रीका के घाना, कांगो, आइवरी कोस्ट आदि से किया करते थे। वक़्त के साथ वे भी संघी सांचे में ढलकर दीवार की ओट में छुप गए।
क्यों? क्योंकि भारत की प्रति व्यक्ति आय आज 20 अफ्रीकी देशों से कम है और ऊपर मैंने जितने भी देश गिनाए हैं, वे सब आमदनी के मामले में भारत से ऊपर हैं। क्योंकि भारत की जीडीपी फिलहाल दुनिया में 144वें नंबर पर है। यह वही भारत है, जिसने 1990 से 2020 के बीच 30 करोड़ लोगों को ग़रीबी की रेखा से उबारा था।
यह वही भारत है, जिसने 1991 में भुगतान संतुलन के दौर में अपना सोना गिरवी रखा। लेकिन कसम भी खाई कि अब किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे। नरेंद्र मोदी ने 35 साल भीख मांगी। अब विश्वगुरु भीख मांग रहा है।
अमेरिकी सांसद जॉन नीली कैनेडी ने भरी सीनेट में डॉक्टर एंथोनी फॉसी की WHO परस्ती पर सवाल किया था- अगर आप चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग को उठाकर सिर के बल पलट दें तो क्या उनकी जेब से WHO नहीं गिरेगा? फॉसी की बोलती बंद हो गयी थी।
जी हां। आज चीन अपनी औकात दिखाने के काबिल है। WHO उसकी मुट्ठी में है और मोदी का भारत वैक्सीन और खैरात की आस में है। तभी तो हमारे रक्षा मंत्री चीन की कड़ी निंदा भी नहीं कर पा रहे हैं। भारत 1991 से भी काफी पीछे जा चुका है।

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