कांग्रेस के युवा नेता और राहुल-प्रियंका गांधी के करीबी जितिन प्रसाद कांग्रेस से अलग हो गए हैं । लगभग 20 साल तक कांग्रेस के कट्टर सदस्‍य होने के बावजूद जितिन बुधवार को बीजेपी में शामिल हो गए । बीजेपी का ये कदम अगले साल यूपी में होने वाले चुनावों में मददगार साबित हो सकता है, लेकिन कांग्रेस के लिए ये किसी झटके से कम नहीं । पिछले साल गैर गांधी कांग्रेस अध्‍यक्ष की मांग करने पर पार्टी के अंदर उनका भारी विरोध हुआ था । लेकिन अगर ये कहें कि बगावत जितिन को परंपरा में मिली है तो गलत नहीं होगा ।

जितिन प्रसाद के पिता कुंअर जितेंद्र प्रसाद ने भी साल 2000 में कांग्रेस के अध्‍यक्ष पद के लिए सीधे सोनिया गांधी को चुनौती दी थी। जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद ने सन 1970 में यूपी विधान परिषद के सदस्‍य के तौर पर राजनीति में कदम रखा। इसके बाद वो पांचवीं लोकसभा के लिए 1971 में शाहजहांपुर से चुने गए। प्रसाद, कांग्रेस के उपाध्‍यक्ष भी रह चुके थे। साल 1998 में जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस के अध्‍यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने का ऐलान किया था तब उन्‍हें कांग्रेस का सदस्‍य बने महज एक साल ही हुआ था।

सोनिया गांधी ने 1997 में ही कांग्रेस की प्राथमिक सदस्‍यता ली थी। 1998 में उन्‍होंने कांग्रेस का अध्‍यक्ष पद का चुनाव लड़ने का ऐलान किया। तब कांग्रेस अध्‍यक्ष रहे सीताराम केसरी इसका खुलकर विरोध नहीं कर सके थे । लेकिन पार्टी में कई नेता इसके विरोध में थे, कांग्रेस नेता जितेंद्र प्रसाद भी इससे सहमत नहीं थे लेकिन तब उन्‍होंने इसका विरोध नहीं किया। लेकिन साल 1999 में शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने सोनिया के खिलाफ विरोध के सुर मुखर किए, उनके मुताबिक इटली मूल की सोनिया गांधी भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन सकती थीं । ये विवाद इतना बढ़ा कि तीनों को पार्टी से निकाल दिया गया।

इन तीनों के पार्टी से जाने के बाद, राजेश पायलट और जितेंद्र प्रसाद ने विरोध के सुर छेड़े । दोनों ही वंशवाद के खिलाफ अपनी नाखुशी जाहिर कर चुके थे, जानकारों के मुताबिक 1998 में राजेश पायलट ही सोनिया के खिलाफ अध्‍यक्ष पद के लिए खड़ा होना चाहते थे, उनके मुताबिक सोनिया से ज्‍यादा काबिल और अनुभवी नेता कांग्रेस में मौजूद हैं तो बागडोर उन्‍हीं के हाथ में होनी चाहिए। साल 2000 में राजेश पायलट ने योजना भी बनाई कि वह सोनिया के खिलाफ अध्‍यक्ष पद के लिए खड़े होंगे, उन्‍होंने जितेंद्र प्रसाद के साथ पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के जन्‍मदिन 21 मई को जबर्दस्‍त रैली भी की। लेकिन इसके 20 दिन के अंदर 11 जून को उनकी एक कार दुर्घटना में मौत हो गई।

पायलट की मौत के बाद जितेंद्र प्रसाद ने बागवती तेवर अख्तियार कर लिए, वह 2000 के अध्‍यक्ष पद के चुनाव में सोनिया के खिलाफ खड़े हुए। नवंबर 2000 में चुनाव हुए, लेकिन उन्‍हें बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। चुनाव में पड़े 7,542 वोटों में से उन्‍हें केवल 94 वोट मिले । बताया जाता है कि जितेंद्र प्रसाद इस करारी हार को बर्दाश्‍त नहीं कर सके, उन्‍हें ये अपना अपमान लगा । 16 जनवरी 2001 को ब्रेन हैमरेज से उनकी मृत्‍यु हो गई।

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