ध्रुव गुप्त
आज वट सावित्री का पर्व है। आज विवाहिता हिन्दू महिलाएं अपने सुहाग के लिए वटवृक्ष की पूजा कर उसके चारों तरफ मन्नत के धागे बांधती हैं। इस पूजा को लोगों की आस्था से जोड़ने के लिए उसकी पृष्ठभूमि में पति सत्यवान को यम से पाश से छुड़ाकर लाने वाली सावित्री की कथा जोड़ी गई।
कालांतर में पूजा-विधि के ढेर सारे कर्मकांड भी उससे जुड़े, मगर यह पर्व मूलतः प्रकृति पर्व है। हमारी संस्कृति में पर्यावरण की रक्षा में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले तीन वृक्षों – पीपल, बट और नीम की रक्षा के लिए पीपल पर ब्रह्मा, नीम पर देवी और वट में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास बताया गया है।
वट सावित्री बरगद जैसे पेड़ों के सम्मान का आयोजन है। सावित्री और सत्यवान की कथा प्रतीकात्मक है। सत्यवान पृथ्वी का प्रतीक है और सावित्री प्रकृति की। हमारी पृथ्वी हर साल मरती है और प्रकृति हर साल उसे नया जीवन देती है। विशाल और दीर्घायु बटवृक्ष अमरत्व का प्रतीक है।
पृथ्वी के नवजीवन की प्रक्रिया ज्येष्ठ मास की अमावस्या को इसीलिए शुरू मानी जाती है क्योंकि यह समय ताप में झुलसती और निष्प्राण पृथ्वी पर मानसून की बारिश के उतरने और प्रकृति के खिलने का समय है। वट सावित्री का वास्तविक संदेश यह है कि हम प्रकृति और उसके सबसे बड़े अवदान वृक्षों का सम्मान और उनकी रक्षा करें।

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