कृष्णकांत
अगर आप कविता लिखते हैं और आपको ‘साहित्यिक नक्सल’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘अराजक कवि’ आदि का खिताब लेना है तो गुजरात साहित्य अकादमी से संपर्क कर सकते हैं.
गुजरात साहित्य अकादमी के कोई अध्यक्ष हैं विष्णु पांड्या. इन महाशय ने बताया है कि गंगा में तैरती लाशों पर ‘शववाहिनी गंगा’ शीर्षक से कविता लिखने वाली गुजराती कवि पारुल खाखर ‘अराजक’ और इस कविता को सराहने वाले ‘साहित्यिक नक्सली’ हैं. इन महाशय को पारुल की कविता के विरोध में संपादकीय लिखना पड़ा और यह भी कहना पड़ा कि जो लोग इस कविता की तारीफ कर रहे हैं वे “केंद्र विरोधी और केंद्र विरोधी राष्ट्रवादी विचारधाराएं हैं.” इस कविता में उन्हें ‘साजिश’ दिखी. ‘साजिश करने वाले वामपंथी और तथाकथित उदारवादी हैं, जिनकी ओर कोई ध्यान नहीं देता’. जिनकी ओर कोई ध्यान नहीं देता, उनपर इस महापुरुष को संपादकीय खर्च करना पड़ा.
उस महान साहित्यकार के बारे में आप कल्पना करें जो इस बात से नहीं विचलित है कि इंसानों का शव चील कौवे नोच रहे हैं, वह इस बात से विचलित है कि सत्ता की बदनामी हो गई. ऐसा घिनौना काम तो पैसा लेकर छविनिर्माण करने वाली पीआर एजेंसियां भी शायद करती हों. लेकिन स्वनामधन्य साहित्यकार ऐसा कर रहा है.
अच्छा हुआ कि पारुल ने ये कविता लिखी. इसी बहाने ये भी पता चला कि गुजराती साहित्य अब भी विकृत रूप में ही सही, मगर जिंदा है. ये भी पता चला कि गुजराती साहित्य का बाकी कोई हस्तक्षेप हो या न हो, मगर सत्ता के कुछ दलाल जिंदा हैं जो धरती के नरक बन जाने पर तो चिंता नहीं करते, लेकिन सत्ता की आलोचना पर दो रुपये प्रति ट्वीट वाले ट्रोल की भूमिका में आ जाने के लिए बेचैन हैं.
बेहतर होता कि विष्णु पांड्या एक कविता, कहानी, उपन्यास या जो भी महान साहित्य वे रचते हों, उस विधा में एक महान रचना रच देते और इस बात की ​तारीफ कर देते कि नागरिकों को आक्सीजन, दवा, वेंटिलेटर के बगैर तड़पाकर मार देना राष्ट्रवादी पुण्य का काम है और बिना अंतिम संस्कार के लोग नदियों में तैरें, उन्हें चील कौवे नोचें, ये देश के लिए बड़े गौरव की बात है.
गुजरात साहित्य अकादमी के महान अध्यक्ष को चाहिए कि गंगा किनारे मिलीं हजारों लाशों के महात्म्य में कोई महाकाव्य लिख दें. क्या पता भारत उनकी इस क्रूरतापूर्ण और पाशविक रचनात्मकता से ही विश्वगुरु बन जाए.
आपके परिजनों की लाशें गंगा में तैर रही हैं, लोग चार अदद निर्धारित दवाओं के बगैर मर रहे हैं तो उसकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं हैं. लेकिन अगर आप इसकी आलोचना करें तो आपको सर्टिफिकेट देने वाले सत्ता के तमाम दुमछल्ले मौजूद हैं. वे साहित्यकार हैं, कलाकार हैं, लेखक हैं, पत्रकार हैं. वाह! इन्हें कोई चुल्लू भर पानी भेजो.
यह हादसा भी हमारी पीढ़ी को ही देखना था जहां साहित्य का पर्दा लगाकर भाड़े के सियासी शूटर साहित्यकार बने फिरते हैं.
पारुल की वह कविता अगर आपने न पढ़ी हो तो यहं पढ़ लें और ‘साहित्यिक नक्सल’ होने का गौरव प्राप्त करें.
‘शव वाहिनी गंगा’
एक साथ सब मुर्दे बोले ‘सब कुछ चंगा-चंगा’
साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा
ख़त्म हुए श्मशान तुम्हारे, ख़त्म काष्ठ की बोरी
थके हमारे कंधे सारे, आंखें रह गईं कोरी
दर-दर जाकर यमदूत खेले
मौत का नाच बेढंगा
साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा
नित लगातार जलती चिताएं
राहत मांगे पलभर
नित लगातार टूटे चूड़ियां
कुटती छाती घर-घर
देख लपटों को फ़िडल बजाते वाह रे ‘बिल्ला-रंगा’
साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा
साहेब तुम्हारे दिव्य वस्त्र, दैदीप्य तुम्हारी ज्योति
काश असलियत लोग समझते, हो तुम पत्थर, ना मोती
हो हिम्मत तो आके बोलो
‘मेरा साहेब नंगा’
साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

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