Zaigham Murtaza
मुसलमान झंडा उठाने की बजाय पावर शेयरिंग फार्मूला पर सोचे तो बताइए इस देश में ब्राह्मण के अलावा कौन सा जातीय समूह है जो मुसलमान सीएम बर्दाश्त कर सकता है? ब्राह्मण पीएम बने और जिन राज्यों में उसकी संख्या ज़्यादा है वहां सीएम भी बना ले।
अगर इस आधार पर रणनीतिक और राजनीतिक समझौता हो तो देश भर में यूपी, दिल्ली, काश्मीर, बंगाल, असम, केरल समेत कम से कम सात मुसलमान और पंद्रह ब्राह्मण सीएम बन सकते हैं। कश्मीर से लेकर तेलंगाना और यूपी से बंगाल की सियासी तस्वीर बदल सकती है। बस हर राज्य में डिप्टी सीएम और आठ-दस मंत्रालय देकर तीसरा और चौथा जातीय समूह और जोड़ना है। इसमें दूसरे अल्पसंख्यक और जनजातीय समूह भी आ जाएं तो सौ साल मिल बांट कर राज किया जा सकता है।
सबसे बड़ी बात, मुसलमान को इससे तीन बड़े फायदे हैं। एक तो नुक़सान पहुंचाने वाला सबसे मज़बूत समूह राजनीतिक मोहताज रहेगा तो दंगे नहीं होंगे। सत्ता में हिस्सेदारी मिलेगी और मुसलमान को मुख्यधारा की राजनीति में बराबरी हासिल होगी। ब्राह्मण का फायदा ये है कि उसपर कोई भरोसा नहीं करता और सियासत में मुसलमान के अलावा उसे कोई और झेल नहीं सकता। सत्ता में रहेगा तो उसका राजनीतिक बर्चस्व बढ़ेगा और ठुकाई, कुटाई और सार्वजनिक मान मर्दन कम होगा। भिक्षक, याचक वाला टैग हटेगा और समाज में दूसरे लोगों के साथ रहने का सलीक़ा सीखेगा।
बाक़ी इस विचार का विरोध करने वालों को समझना चाहिए कि देश के दूसरे जातीय समूहों की तरह मुसलमान को भी अपने हित में राजनीतिक और सामाजिक गठबंधन करने का बराबर का अधिकारी है। ब्राह्मण अगर बीएसपी, समाजवादी पार्टी, आरजेडी, अपना दल जैसी घोर जातीय राजनीति करने वाली पार्टियों की प्राथमिकता हैं और उनके लिए ही अछूत नहीं है जो ब्राह्मण के कथित शोषित हैं तो फिर हम उससे किस बात का बैर पाले हैं?
राजनीति संभावनाओं का खेल है और हर तरह की संभावनाएं तलाशी जानी चाहिएं। ब्राह्मण शर्त नहीं है। हमारी प्राथमिकता राजनीतिक बराबरी और सम्मान है। यह चाहे यादव दें, जाटव दें, ठाकुर दें या लाला। सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन का मतलब ही इस हाथ दे, उस हाथ ले है। हमारी अपना प्रतिनिधित्व इस देश में सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा शिकार हुआ है। सामाजिक न्याय की लड़ाई ने हमें किनारे लगा दिया है और अब हम अप्रासंगिक हैं। हमारी गिनती वोटर की है, राजनीतिक ताक़त की नहीं।
ख़ैर, कांशीराम पहले ही कह गए हैं कि कमज़ोर का काम क्रांति करना या विचारधारा की लाश उठाए फिरना नहीं है। भूखे को जिससे, जिस समय रोटी मिले, लपक लेनी चाहिए। यानी इतना राजनीतिक ऑपरच्यूनिज़्म तो होना ही चाहिए कि ख़ुद भी प्रासंगिक बने रहें। इस सबके बिना अपनी क़यादत, राजनीतिक हिस्सेदारी, एंपावरमेंट जैसी बातें खोखली और आत्मघाती हैं।

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