UP Politics: पल्लवी vs अनुप्रिया पटेल, सियासी अखाड़े में दो बहनों की जोर-आजमाइश, यूपी की महाभारत में क्या है इन चेहरों की अहमियत?

यूपी के सियासी गलियारे में इस समय दो बहनें चर्चा में हैं। एक, अपना दल सोनेलाल की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल हैं, जिनकी पार्टी बीजेपी गठबंधन का हिस्सा है, तो दूसरी उनकी बहन पल्लवी पटेल जो अपना दल ‘कमेरावादी’ की राष्ट्रीय कार्यवाहक हैं। उन्होंने हाल में ही यूपी के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात की। यूपी की चुनावी महाभारत में कुर्मी वोटरों को साधने के लिहाज से अहम इन चेहरों के बारे में जानिए :

‘शून्य’ से सत्ता तक पहुंचीं अनुप्रिया
अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की 17 अक्टूबर 2009 को सड़क दुर्घटना में हुई मौत के बाद पार्टी के लिए नए चेहरे की तलाश उनकी तीसरी बेटी अनुप्रिया पटेल पर थम गई। श्रद्धांजलि सभा में ही अनुप्रिया पटेल के भाषण ने उन्हें पार्टी का चेहरा बना दिया। अनुप्रिया की शादी को एक महीना भी नहीं हुआ था कि उनके सामने सियासी विरासत को आगे बढ़ाने की चुनौती आ गई।

कौन हैं अनुप्रिया पटेल?
जिस पार्टी का लोकसभा में खाता नहीं खुला था, महज पांच साल में वह केंद्र की सत्ता में भागीदार हो गई। लेडी श्रीराम कॉलेज से ग्रेजुएट, एमिटी से एमए और कानुपर विवि से एमबीए अनुप्रिया पटेल 2012 के विधानसभा चुनाव में बनारस के रोहनियां से पार्टी की इकलौती विधायक बनीं। 2014 में बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने वाराणसी लोकसभा सीट चुनी। युवा, महिला और जातीय पैठ इन तीन कारकों के चलते वाराणसी और आस-पास के जिलों में अनुप्रिया का साथ बीजेपी की राजनीतिक जरूरत बन गया।

कब आई खींचतान की नौबत?
अपना दल को दो सीटें दी गईं और दोनों ही उसने निकाल भी लीं। अनुप्रिया पटेल 33 साल की उम्र में मिर्जापुर से सांसद बनीं। 2016 में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में नरेंद्र मोदी टीम में वह सबसे युवा चेहरे के तौर पर शामिल हुईं। अनुप्रिया पटेल के बढ़ते कद से विपक्ष के साथ-साथ परिवार में भी असहज स्थिति पैदा होने लगी। मां और पार्टी की अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने अनुप्रिया की बड़ी बहन पल्लवी पटेल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया।

अनुप्रिया का कद बढ़ता रहा
अनुप्रिया ने इसका विरोध किया और खींचतान का अंत पार्टी के दोफाड़ के रूप में हुआ। 2016 में अनुप्रिया ने अपना दल (सोनेलाल) गठित किया। 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी से गठबंधन में मिली 11 सीटों में 9 पर जीत से अनुप्रिया का कद और बढ़ा। सरकार में अपना दल के कोटे से एक विधायक मंत्री बना। उनके पति आशीष सिंह पटेल अप्रैल 2018 में एमएलसी बन गए।

2019 में अपना दल ने फिर दो लोकसभा सीटें जीतीं, पर इस बार अनुप्रिया को केंद्र में मंत्री नहीं बनाया गया। अब जब यूपी में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं तो एक बार फिर अनुप्रिया पटेल की सक्रियता को केंद्र और प्रदेश सरकार में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए दबाव की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। अनुप्रिया भी जानती हैं कि 2022 का रण साधने के लिए अब भी उनका साथ बीजेपी के लिए अहम है।

सियासत की लैब में साइंस की स्टूडेंट
यूपी की सियासत में पिछड़ों और खासकर कुर्मी समुदाय के बड़े नेता रहे सोनेलाल पटेल की दूसरी बेटी पल्लवी पटेल साइंस की स्टूडेंट रही हैं। इस समय वह सियासत की लैब में चुनाव के समीकरण समझ रही हैं। बायो-टेक्नॉलजी में पीजी पल्लवी अपनी बहन अनुप्रिया पटेल से एक साल बड़ी हैं। हाल में ही उन्होंने सब्जियों व फलों के फंगस पर अपनी डॉक्टरेट पूरी की है।

इसके साथ ही वह मां कृष्णा पटेल की अगुआई में अपनी पार्टी की राह के रोड़े साफ करने में भी जुटी हैं। पल्लवी अपना दल कमेरावादी की राष्ट्रीय कार्यवाहक हैं। पिता सोनेलाल पटेल के साथ पार्टी के कार्यक्रमों में आती-जाती रही हैं। 2008 से वह राजनीतिक रूप से सक्रिय हुईं। 2009 में जब सोनेलाल पटेल का निधन हुआ तो उनकी पत्नी कृष्णा पटेल अपना दल की अध्यक्ष बनीं और अनुप्रिया को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया।

कृष्णा पटेल के गुट का क्या कहना?
कृष्णा पटेल गुट के लोगों का कहना है कि पल्लवी भी संगठन में सक्रिय थीं लेकिन अनुप्रिया पटेल की तरह उनका एक्सपोजर नहीं था। 2014 में कृष्णा पटेल ने पल्लवी पटेल को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया तो अनुप्रिया ने इसका विरोध किया। 2016 में पार्टी पर कब्जे और बंटवारे का विवाद चुनाव आयोग तक पहुंच गया। पल्लवी पटेल ने मां की अगुआई वाली पार्टी के सियासी प्रबंधन को आगे बढ़ाया। 2017 विधानसभा चुनाव में 59 सीटों पर उम्मीदवार भी उतारे लेकिन सफलता नहीं मिली।

2019 में कांग्रेस से गठबंधन
इसी बीच 2018 में सोनेलाल पटेल के नाम पर आयोजनों के बहाने विभिन्न सियासी दलों व वोटरों में पार्टी का आधार बढ़ाने की कोशिशें भी पल्लवी ने जारी रखीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के तौर पर कांग्रेस के ही टिकट पर तीन प्रत्याशी उतारे गए जिनमें गोंडा से कृष्णा पटेल व फूलपुर से पल्लवी के पति पंकज निरंजन उम्मीदवार थे लेकिन कांग्रेस की तरह इनका प्रदर्शन भी निराशाजनक रहा।

क्या कहती है पल्लवी की अखिलेश से मुलाकात?
अब 2022 विधानसभा चुनाव के पहले पल्लवी एक बार फिर पार्टी को प्रभावी बनाने की कोशिशों में लगी हैं। हाल ही में हुई एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव से उनकी मुलाकात को प्रदेश राजनीति में मजबूत साथी की तलाश की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। फिलहाल, यूपी में करीब 10 फीसदी कुर्मी वोटरों की रहनुमाई को लेकर दोनों ही बहनों का दावा है जिसकी सच्चाई का फैसला जनता करेगी।

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