मोहम्मद जाहिद
पुरुषोत्तम राम देश के बहुसंख्यकों के लिए आस्था का विषय हो सकते हैं , उनके नाम पर अयोध्या में बनने वाला मंदिर भी कुछ बहुसंख्यकों के लिए आस्था का विषय हो सकता है पर भाजपा , संघ और राम मंदिर के आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए यह सिर्फ एक राजनैतिक खेल और धन की लूटमार से अधिक कुछ भी नहीं।
सन 1989 के बाद से राम मंदिर बनाने के लिए इक्ट्ठा की गयीं “राम” लिखीं ईंटों को देश के गाँव गाँव , शहर की गली गली “राम चरण पादुका” के नाम पर घुमाया गया और एक आँकड़े के अनुसार विश्व हिन्दू परिषद ने ₹1400 करोड़ इकट्ठा किए।
गरीब से गरीब इंसान जिसके घर में चुल्हा जलाने के लिए पैसे नहीं थे उसने भी राम मंदिर में लगने वाली ईंट को पुरुषोत्तम राम का “चरण पादुका” समझ कर भक्ति भाव में दान दिया।
इन 32 सालों में यह ₹1400 करोड़ कहाँ गये यह विहिप के ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके प्रवीण तोगड़िया कई बार बता चुके हैं , कैसे इस पैसे की लूट हुई इसका खुलासा अन्य लोग भी कर चुके हैं।
चंपत राय उसी विश्व हिन्दू परिषद के वर्तमान में उपाध्यक्ष हैं और राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव हैं , अयोध्या में राम मंदिर निर्माण इनके ही नेतृत्व में हो रहा है जिसमें अब ₹16 करोड़ के गबन के आरोप लग रहे हैं।
अब खबर है कि राम मंदिर के लिए ट्रस्ट द्वारा ₹18 करोड़ में खरीदी ज़मीन को इस खरीद के 15 मिनट पहले बेचने वाले ने मात्र ₹2 करोड़ में खरीदा।
प्रथम दृष्टया इसमें कुछ गलत नहीं दिखता कि किसी ने एक ज़मीन जिस दाम में खरीदी उसे और किसी को 9 गुना अधिक दाम में बेच दी। यह कहीं से भी गलत नहीं लगता , ज़मीन की खरीद फरोख्त में दाम खरीदने वाले की ज़रूरत पर तय होता है और यह संभव है कि जो ज़मीन फलाने ने ₹2 करोड़ में खरीदी , वह किसी के लिए बेहद अहम हो और उसका कोई खरीददार तुरंत ही उसे ₹18 करोड़ में खरीद ले।
ज़मीन के व्यापार में यह मामूली बात है , फ्राॅड तो तब होता जब कि एक ज़मीन को बार बार बेचने में स्टांप ड्यूटी ना चुकाई जाए और नियमों का पालन ना हुआ हो। या इससे अर्जित लाभ पर आयकर ना दिया हो , आयकर ना देना भी ज़मीन बेचने वाले का वित्तीय अपराध है ना कि ज़मीन घोटाला।
मगर ठहरिए ,
जब 15 मिनट के अंतराल में दो बार बिकी ज़मीन के गवाह एक ही हों और वह राम मंदिर तथा प्रशासन के पदाधिकारी हों , और दूसरी बार बिकी ज़मीन के स्टांप , पहली बार ज़मीन बेचने के पहले खरीद लिए जाएँ तो इसमें अब कहने को कुछ नहीं बचता।
आनरिकार्ड यह बात सामने आ चुकी है कि जो जमीन रवि मोहन तिवारी और सुल्तान अंसारी ने हरीश पाठक से खरीदी उसका स्टांप तो 5 बजकर 22 मिनट पर खरीदा गया, लेकिन इसी ज़मीन को रवि मोहन तिवारी और सुल्तान अंसारी ने बेचने के लिए जो एग्रीमेंट साढे़ 18 करोड़ रुपये का किया उसका स्टांप 5 बजकर 11 मिनट पर ही खरीद लिया गया। यानी ट्रस्ट ने जिससे जमीन खरीदना था उसके नाम से ज़मीन होने के 11 मिनट पहले से ही स्टांप खरीद लिया।
दूसरी मज़ेदार बात यह है कि इस दोनो डील के गवाह एक ही अनिल मिश्रा और ऋषिकेश उपाध्याय थे।और 5 मिनट में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा इस खरीद का प्रस्ताव पास करा दिया गया ₹17 करोड़ फटाफट ट्रान्सफर भी हो गये।
ध्यान दीजिए कि अनिल मिश्रा राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ट्रस्टी हैं तो ऋषिकेश उपाध्याय अयोध्या के मेयर हैं और दोनो पंडिज्जी लोग संघी हैं।
अरे भाई , कुसुम पाठक और हरीश पाठक जो ज़मीन रवि मोहन तिवारी और सुल्तान अंसारी को 15 मिनट पहले ₹2 करोड़ में बेचीं वह सीधे राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को ही ₹2 करोड़ में बेच देतीं तो गरीब लोगों का दिया ₹16 करोड़ दान बच ही जाता।
इस मुल्ले को टांगिए और टाइट करिए ₹16 करोड़ का बंदरबाट कहाँ किया गया सब सामने आ जाएगा , बताईए भला जिस राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में मुल्लों का प्रवेश प्रतिबंधित है उसी क्षेत्र के निर्माण के लिए एक मुल्ले को ₹8 करोड़ दे दिए गये , बाकी का ₹8 करोड़ रवि मोहन तिवारी जी ने कमा लिए।
राम नाम के नाम पर राम धन की लूट मची हुई है , गरीब से गरीब क्या और अमीर से अमीर क्या , क्या अदना और क्या देश का राष्ट्रपति , सब मंदिर निर्माण में चंदा दे रहे हैं और जिनके हाथों में यह काम है वह एक मुल्ले के कंधे पर बंदूख रखकर पैसे डकार रहे हैं।
खैर हमें क्या।

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