इब्न ए आदम
राजीव गांधी के बाद कांग्रेस नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी से होते हुए जब सोनिया गांधी के पास पहुँची तब केंद्र में अटल जी की सरकार थी । 2004 में शाइनिंग इंडिया के नारे के साथ अटल जी अतिआत्मविश्वास के साथ चुनाव में उतरे और सोनिया गांधी के नेतृत्व में UPA ने उन्हें चुनाव में हरा दिया । सोनिया गांधी एक दिन में लीडर नहीं बनी थी , 6 साल विपक्ष की नेता रही ।राजीव गांधी की मौत के 13 साल बाद उनमें इतनी परिपक्वता आयी थी कि उन्होंने अटल जी जैसे अनुभवी नेता के मज़बूत गठबंधन को हरा दिया ।
2004 में राहुल गांधी ने राजनीति में प्रवेश किया और प्रवेश करते ही उन्हें UPA की सरकार मिल गयी । उन्हें कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा । वो राजनीति समझ ही नहीं पाए और चाटुकार नेताओ से घिरे रहे । कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और ज़मीनी नेताओ से इन चाटुकारो ने उन्हें मिलने ही नहीं दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि 2014 आते आते कांग्रेस अंदर से कमज़ोर हो गयी और सत्ता से बुरी तरह हारकर बाहर हो गयी । चाटुकार नेता जो राहुल गांधी के क़रीब थे , वो भी एक एक करके भाजपा में जा मिले , कार्यकर्ता और ज़मीनी नेता पहले ही साइड से लगा दिए गए थे । 7 साल विपक्ष में रहने के बाद राहुल गांधी अब राजनीति में परिपक्व दिखने लगे हैं । उनके एक ट्वीट पर पूरी सरकार हिल जाती है और सरकार का हर मंत्री उन्हें गाली देने लगता है ।
2012 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सपा ने चुनाव जीता और मुलायम सिंह यादव ने भविष्य की राजनीति को देखते हुए अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बना दिया । अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में बहुत काम कराए , उनके पास विज़न था लेकिन वो राजनीतिक नौसीखिए साबित हुए क्यूँकि उन्हें भी सत्ता संघर्ष से नहीं मिली थी । उनके साथ भी यही हुआ , सत्ता में रहते हुए वो अपने नौ रत्नो में घिरे रहे और ज़मीनी नेताओ और कार्यकर्ताओं से उनका सम्बंध टूट गया । शिवपाल यादव जैसे नेता किनारे लगा दिए गए । पार्टी में टूट हो गयी । चुनाव हुए और एतिहासिक काम करवाने के बावजूद अखिलेश यादव चुनाव में बुरी तरह हारकर सत्ता से बाहर हो गए । अखिलेश यादव के कई रत्न भी सत्ता बदलते ही भाजपा के पाले में चले गए । अब साढ़े चार साल विपक्ष में रहते हुए अखिलेश यादव ने राजनीति को समझा और लोगों को जोड़ा जिसकी वजह से प्रदेश में अब सपा की लहर दिख रही है । अब भी अखिलेश यादव अगर शिवपाल यादव को पार्टी में वापस ले लेंगे तो यह उन्हें भी पता है कि उनके लिए 2022 का चुनाव और आसान हो जाएगा ।
चिराग़ पासवान के साथ भी यही हुआ । रामविलास पासवान ने संघर्ष करके पार्टी बनायी , पार्टी को मज़बूत करने के चक्कर में मौसम वैज्ञानिक तक बन गए । उनके जाने के बाद पार्टी चिराग़ पासवान के हाथ में आयी , चिराग़ को संघर्ष के बिना पार्टी मिल गयी और वो भाजपा के जाल में फँस गए और आज पैदल हो गए । वो भी ठंडे दिमाग़ से अगर संघर्ष के रास्ते पर निकलेंगे तो उम्मीद है पार्टी फिर से खड़ी कर लेंगे क्यूँकि बाप की विरासत बेटे को ही मिलती है , भाई को नहीं । अगर चिराग़ संघर्ष करेंगे तो राम विलास पासवान के वोटर चिराग़ की तरफ़ ही दिखाई देंगे ।
तेजस्वी यादव को विरासत में सत्ता नहीं संघर्ष मिला और वो जब से राजनीति में आए हैं तब से ( 20 महीने की सत्ता को छोड़कर ) विपक्ष में ही है । उनसे इस संघर्ष में तजुर्बे की कमी की वजह से काफ़ी ग़लतियाँ हुई , लालू यादव के कई करीबी लोग उनसे दूर हो गए लेकिन फिर भी तेजस्वी ने खुद को करेक्ट कर लिया और पिछला विधान सभा चुनाव अकेले दम पर शानदार लड़ा । जनता ने उन्हें जिता दिया था लेकिन सिस्टम से वो हार गए ।
राजनीति में जितने लोगों को भी सत्ता संघर्ष के बिना मिली है , वो उस सत्ता को पचा नहीं पाए जिसकी वजह से उन्हें और पार्टी को नुक़सान झेलना पड़ा । विपक्ष में रहते हुए संघर्ष करके ही नेता राजनीति में परिपक्व बन पाता है ।

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