मोहम्मद जाहिद
राम के नाम पर इस देश में राजनैतिक खेल खेलने वालों का चरित्र और स्वभाव रावण से भी बदतर है। यह मैं एक नहीं 100 बार लिख चुका हूँ।
जिस राम ने अपने पिता के वचन का मान रखने के लिए राजपाट छोड़ा और जंगल चले गये , अपने को रामजादे कहलवाने वाले यह राभक्त सत्ता के लिए अपने राजनैतिक पिता आडवाणी को जबरन सन्यास दिलवा दिए।
यह “जयश्रीराम” के नारा लगाने वाले बिल्किस से लेकर आसिफा तक के बलात्कार के समर्थक हैं , तो मोहसिन शेख और अखलाक से लेकर आसिफ तक के माबलिंचिग के समर्थक हैं।
क्या राम ऐसे थे ? कदापि नहीं , ऐसा तो रावण भी नहीं था।
रावण ने तो सूपनखा के अपमान का बदला लेने के लिए सीता का अपहरण मात्र किया था , और जब तक सीता उनके कब्ज़े में रहीं “अशोक वाटिका” में पवित्रता और सम्मान के साथ रहीं। उसने अपनी कानी उंग्ली से उनको छूआ भी नहीं। जबकि कुछ भी कर सकता था , लंकेश था।
श्रीराम का नारा लगाने वाले तो रावण से भी गये गुजरे हैं , रावण में तो केवल घमंड था , इनमें इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ है , झूठ , छल , कपट , मक्कारी , फरेब , बलात्कारी प्रवृत्ति , हत्यारे , दंगाई , लूटेरे , गाली , नफरत , एहसान फरामोशी , हठ और दुष्ट व्यवहार।
यही है “सड़ा_हुआ_समाज”
इतना सब कुछ तो रावण में भी नहीं था , फिर भी यह पुरुषोत्तम राम के चरित्र के विपरीत रावण के चरित्र के करीब अधिक हैं , इसीलिए यह रामजादे नहीं “रावणजादे” अधिक हैं।
अयोध्या में बन रहे राम के मंदिर की आड़ में इतिहास से लेकर वर्तमान तक इन्हीं “रावणजादों” ने झूठ और फरेब के बुनियाद के आधार पर केवल राम के आदर्शों पर आक्रमण किया है और कुछ नहीं। राम के नाम पर बन रहे मंदिर के नाम पर केवल पहले वोटों की लूट हुई अब धन की भी लूट जारी है।
इसीलिए कहता हूँ कि यह “राम विरोधी” हैं।
भरी जनसभा में यदि त्रिलोक स्वामी राम ने धोबी को डपट कर भगा दिया होता और सीता पर लगाए आरोप के कारण उसको दंड देकर यूएपीए जैसे किसी कानून के जरिए जेल में बंद कर दिया होता तो वह आज पुरुषोत्तम “राम” नहीं होते।
पर यही चरित्र आज इनके नाम से अपना राजनैतिक जीवन जीने वाले दिखा रहे हैं और मंदिर के लिए खरीदी जमीन पर लगे घोटाले के आरोपों पर वह आरोप लगाने वालों पर हमला कर रहे हैं उनके ऊपर मुकदमा करने की धमकी दे रहे हैं।
राम ने ऐसा तो नहीं किया था। राम ने तो दिखाया कि यदि आरोप लगते हैं तो किसी को क्या करना चाहिए। राम ने तो आरोप लगने पर जाँच करने के लिए अपनी प्राणप्रिय अपनी धर्मपत्नी सीता को अग्नि परिक्षा देने के लिए कहा।
राम जब सीता को रावण के पास से छुड़वाकर अयोध्या ले आए तो उनके राज्याभिषेक के कुछ समय बाद मंत्रियों और दुर्मुख नामक एक गुप्तचर के माध्यम से राम को जानकारी हुई कि अयोध्या के लोग सीता की पवित्रता के विषय में संदिग्ध हैं इसलिए सीता और राम को लेकर अनेक मनमानी बातें बनाई जा रही हैं। सभी कहते हैं कि अग्निपरीक्षा देगा पड़ेगी। उस वक्त सीता गर्भवती थीं।
भरी सभा में एक धोबी के सीता पर संदेह किए जाने के कारण राम ने सीता को अग्निपरीक्षा का आदेश दिया और सीता ने ग्लानि, अपमान और दु:ख से विचलित होकर अग्निपरीक्षा दीं और जलती हुई चिता में प्रवेश किया तथा अग्निपरीक्षा में सफल रहीं।
अब इस परिणाम के बावजूद कोई कुछ कहे तो त्रिलोक स्वामी राम उसका वध कर सकते थे , दंड दे सकते थे , उस पर यूएपीए जैसा कुछ लगा सकते थे , थर्ड डिग्री लगाकर ऐसे लोगों को सबक सिखा सकते थे या अपने देश से बाहर जाने का अदेश दे सकते थे , जैसे आजकल पाकिस्तान जाने को कहा जाता है।
पर नहीं , इस अग्निपरीक्षा के बाद भी जनसमुदाय में तरह-तरह की बातें बनाई जाने लगीं, तब राम के समक्ष फिर से धर्मसंकट उत्पन्न हो गया और राम ने वंश को कलंक से बचाने के लिए लक्ष्मण से कहा कि वे सीता को तपोवन में छोड़ आएं।
यह होता है “राम चरित्र” , वह तो त्रिलोकस्वामी थे , उनको यह सब करने की क्या ज़रूरत थी ? पर एक होता है “राजधर्म” राम ने उसको निभाया। अपने राज्य की जनता के शक और शंका को दूर किया।
ज़मीन घोटाले में कुछ चीज़ें तो सीता की पवित्रता के विपरीत स्पष्ट घोटाले के तौर पर दिख रही हैं और जो 2011 से ऐग्रीमेन्ट टू सेल को आधार बताया जा रहा है वह झूठा है और एक ही ज़मीन के अलग अलग व्यक्तियों के नाम का अलग अलग समय का ऐग्रीमेन्ट है जिसे एक ही एग्रीमेन्ट के तौर पर देश को दिखाया जा रहा है।
1- 2011 में इस ज़मीन को ऐग्रीमेन्ट टू सेल करने वालों में बेचने वाले महबूब आलम, जावेद आलम, नूर आलम और फिरोज आलम हैं जबकि खरीदने वालों की जगह पर कुसुम पाठक और हरीश पाठक का नाम लिखा है।
2- 2014 में 2011 का ही एग्रीमेंट इन्हीं लोगों के बीच रिन्यू करवाया गया था। क्योंकि विवाद कोर्ट में होने की वजह से रजिस्ट्री नहीं हो पायी थी।
3- 2017 में विवाद निपटारा होने के बाद कुसुम पाठक और हरीश पाठक के नाम पर ज़मीन की रजिस्ट्री हुई। अर्थात जो एग्रीमेन्ट टू सेल 2011 में किया गया था वह पुर्ण हो गया।
अर्थात ट्रस्ट अपनी जान बचाने के लिए 2011 के हुए किसी दूसरे ऐग्रीमेन्ट टू सेल का हवाला दे रहा है।
4-2019 में दो करोड़ की कीमत पर फिर से जमीन बेचने की प्रक्रिया शुरू हुई और साल 2019 में कुसुम पाठक और हरीश पाठक का सुल्तान अंसारी समेत आठ लोगों के साथ रजिस्टर्ड एग्रीमेंट हुआ तथा जमीन की कीमत दो करोड़ लगाई जाती है और ₹50 लाख पेशगी दिखाई जाती है।
5-मार्च 2021 की रजिस्ट्री के दस्तावेजों में इस ₹50 लाख का कहीं ज़िक्र ही नहीं बल्कि सीधे ₹2 करोड़ के आरटीजीएस का ज़िक्र है।
अर्थात ₹50 लाख का घपला
6- 2019 में इस ज़मीन का सुल्तान अंसारी और 8 अन्य लोगों के नाम एग्रीमेन्ट टू सेल होता है और जब मार्च 2021 में इस जमीन की रजिस्ट्री कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने की तो खरीदने वाले में सुल्तान अंसारी और उनके साथ रवि मोहन तिवारी मात्र हैं। और एंग्रीमेंट टू सेल के दौरान सुल्तान अंसारी के साथ लिखे आठ लोगों के नाम रजिस्ट्री के दौरान गायब हैं जबकि मोहन तिवारी का नया नाम डील से जुड़ जाता है। इस सौदे के दौरान जमीन की कीमत दो करोड़ रुपये हैं।
अर्थात उस एग्रीमेन्ट की वैधता भी समाप्त
7- मतलब कि ट्रस्ट के अनुसार 9 साल में जो जमीन ₹2 करोड़ से ₹20 करोड़ की हो गयी थी उसे 8 लोग अवें ही छोड़ कर चले गये।
अर्थात वह 8 लोग मुर्ख थे
8- मात्र 10 मिनट में हुई पहली रजिस्ट्री के बाद किस आधार पर दूसरी रजिस्ट्री हुई जबकि दाखिल खारिज के बाद ही यह प्रक्रिया संभव है और दाखिल खारिज की एक मियाद होती है।
9- मंदिर से 3 किमी दूर खरीदी गयी इस जमीन का मंदिर से क्या लेना देना ?
इन 9 सूत्रीय गंभीर और स्पष्ट आरोपों के बावजूद संघ और ट्रस्ट के लोग जिस तरह जवाब ना देकर थेथरई अपना रहे हैं , दूसरे दूसरे एग्रीमेन्ट टू सेल का कागज मीडिया में दिखा रहे हैं और आरोप लगाने वालों को हिन्दू विरोधी बता रहे हैं उनको राम के चरित्र से सीखना चाहिए कि कैसे उन्होंने सीता की जाँच कराई और फिर भी त्याग दिया। कसम से राम जी आज होते तो एक युद्ध इनसे लड़ रहे होते और मैं हनुमान की तरह उनके साथ होता।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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