सौमित्र रॉय
भारत मुद्रास्फीतिजनक मंदी के कगार पर खड़ा है। मोदी सरकार और बिक चुकी मीडिया की झूठी सकारात्मकता पर मत जाइए। थोक मूल्य सूचकांक 12.94% की ऐतिहासिक ऊंचाई पर है। खुदरा मूल्य सूचकांक भी 6% की हद से बढ़कर 6.30% पर है।
इन सबके बीच आम लोगों की आमदनी लगातार कम होने से देश में अमीर-ग़रीब के बीच असमानता तेज़ी से बढ़ रही है। लगता है मोदी सरकार UPA 2 की तरह लकवाग्रस्त हो चुकी है। उसे चुनाव और सत्ता बचाने के सिवा कुछ दिख नहीं रहा है।
RBI अभी अगस्त तक कुछ करने के मूड में नहीं है। 650 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार पर बैठी मोदी सरकार को सरकारी खर्च की दिशा छोटे उद्यमों और ग़रीबों की तरफ मोड़ना चाहिए, जो नहीं हो रहा है।
उल्टे सत्ता बचाने के लिए कैबिनेट विस्तार का बोझ जनता पर डालने और तेल के दाम महंगे कर राजस्व घाटे की भरपाई की जा रही है। यही हाल रहा तो सितंबर तक तेल के दाम 150 रुपये प्रति लीटर से ऊपर जा सकते हैं। मोदी सरकार शायद ही तेल के दाम कम करे।
तेल के दाम में प्रति 10% की बढ़त महंगाई में 50 बेसिस पॉइंट की वृद्धि करती है। लेकिन देश हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर और सियासती दांव-पेंच में उलझा है। पर्दे के पीछे देश लगातार मंदी में डूब रहा है।
“उग रहा है दर-ओ-दीवार से सबज़ा ग़ालिब,
हम बयाबां में हैं और घर में बहार आई है”।

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