सौमित्र रॉय
2019 में मोदी ने 6 साल में 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी का जुमला फेंका था। महंगाई दर के आधार पर आंकें तो 2025 तक देश की इकॉनमी 3 बिलियन डॉलर को छू सके तो भी बड़ी बात होगी। कोविड ने इकॉनमी को 200-300 बिलियन डॉलर का नुकसान पहुंचाया है।
2016 में मोदी की मूर्खतापूर्ण नोटबन्दी ने बाजार से 86% करेंसी का सफ़ाया कर दिया था। उसके बाद एक सड़ा सा GST आया, जिसने कारोबारियों की कमर तोड़ दी। नोटबन्दी, GST और मूर्खतापूर्ण लॉकडाउन ने रोज़गार की वाट लगा दी। इस साल की शुरुआत से 2.5 करोड़ लोग रोजगार गंवा बैठे हैं।
देश में 7.5 करोड़ लोग ग़रीब हो गए। भारत ने बीते एक दशक में सालाना 43 लाख नौकरियां ही पैदा की हैं। हालांकि फेकू ने सालाना 2 करोड़ रोजगार का जुमला भी फेंका था।
मोदी के मेक इन इंडिया के जुमले का लक्ष्य जीडीपी के 25% के बराबर उत्पादन करना था, जो 15% से ज़्यादा नहीं बढ़ सका। उल्टे बीते 5 साल से उत्पादन क्षेत्र में रोजगार आधा हो गया है।
निर्यात एक दशक से 300 बिलियन डॉलर पर अटका हुआ है। बांग्लादेश हमसे आगे निकलकर चीन को टक्कर दे रहा है। मोदी सरकार कर राजस्व और निर्यात से प्राप्त आय से ज़्यादा खर्च कर रही है, जिससे वित्तीय घाटा लगातार बढ़ रहा है।
भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र अमेरिका के मॉडल पर आगे बढ़ रहा है, जो देश की 85% अवाम के लिए महंगा है। कोविड की दूसरी लहर ने इसकी पोल खोल दी है। मोदी ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का भी जुमला फेंका हुआ है। बदले में नोटबन्दी कर मोदी ने सप्लाई चेन को ध्वस्त कर दिया। फिर ग़लत GST ने लागत बढ़ा दी।
फिर भी कृषि ही एक ऐसा क्षेत्र है, जो मोदी की तबाही से बचा हुआ है। हालांकि काले कृषि कानूनों से उसने इसे भी तबाह करने की ठानी है। इतना सारा लिखने के बाद भी मुझे यकीन है कि अवाम मोदी को ही वोट देगी, क्योंकि मुल्ले टाइट हैं। भारत में राम तो बिक गए, आम बाकी है।

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