आज पुरे देश में कबीर जयंती मनाई जा रही है, ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को कबीर जयंती मनाई जाती है, इस बार ये पूर्णिमा 24 जून को है। शिव की नगरी काशी में जन्म लेने वाले संत कबीरदास की पूरी जिंदगी मोक्षदायिनी नगरी वाराणसी में गुजरी मगर उन्होंने मगहर को अपनी मृत्यु के लिए चुना था। गौरतलब है कि संत कबीददास का साल 1518 में निधन हुआ था। कुछ लोग बोलते हैं कि कबीर दास ने जब आखिरी सांस ली तो लोगों में उनके धर्म को लेकर विवाद होने लगा।

हिंदूओं ने बताया कि उनका पार्थिव शरीर जलाया जाएगा तो मुस्लिमों ने कहा कि दफनाया जाएगा, इसी जंग के बीच कबीर का पार्थिव शरीर फूलों में परिवर्तित हो गया जिससे कि आधा-आधा-हिंदू तथा मुसलमानों ने विट्रिक कर लिया तथा इसी कारण मगहर में कबीर की समाधि तथा मजार दोनों हैं।

रूढ़िवादी प्राचीन प्रथाओं को तोड़ने वाले ‘कबीर दास के दोहे’ आज भी जिंदगी में उल्लास भर देते हैं, उनके दोहों ने हमेशा उन्नति का मार्ग खोला है तथा लोगों को सही मार्ग दिखाई है।

कबीर दास के दोहें।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय, सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

तिनका कबहुं ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय, कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

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