कृष्णकांत
गंगा मां ने बुलाया था या नहीं, ये तो नहीं पता है. लेकिन इतना पता है कि नागरिकों की तरह मां गंगा के साथ भी छल किया गया है. मां गंगा से भी कहा गया था कि उनके अच्छे दिन आएंगे, लेकिन जनता की तरह वे भी दुर्दिनों का सामना कर रही हैं.
कहां तो गंगा को निर्मल बनाने का दावा किया गया था, कहां वाराणसी और गाजीपुर में गंगा में शैवाल पनप गए हैं, पानी हरा हो गया है और केमिकल का छिड़काव किया जा रहा है. शैवाल ठहरे हुए या कम बहाव वाले पानी में पनपते हैं. इसी से आप समझ सकते हैं कि मां गंगा के नाम पर सियासत के सिवा कुछ नहीं हुआ है.
नमामि गंगे परियोजना 2014 में शुरू हुई थी. कहा गया था कि 2018 तक गंगा पूरी तरह निर्मल हो जाएंगी. 2018 में एक आरटीआई के जवाब में सरकार ने कहा कि उसे नहीं मालूम है कि गंगा कितनी साफ हुईं.
गंगा को साफ करने की डेडलाइन बार बार बढ़ाई गई है. पहले 2018 में साफ हो जानी थी, फिर ये डेडलाइन 2019, फिर 2020 तक बढ़ाई गई. गंगा साफ नहीं हो सकी हैं और इस कार्यक्रम की डेडलाइन बढ़ती जा रही है.
बीते मार्च में एक संसदीय समिति ने कहा है कि गंगा सफाई परियोजना पर सवाल उठाए. समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि इस योजना के अंतर्गत 20 हजार करोड़ रुपये की निर्धारित राशि में से 31 दिसंबर 2020 तक 9781.38 करोड़ रुपये ही खर्च किये गए. समिति ने सवाल उठाया कि गंगा की सफाई का काम समयसीमा से काफी पीछे चल रहा है. इसके पहले भी संसदीय समिति इस परियोजना पर नाराजगी जता चुकी है.
नमामि गंगे परियोजना के लिए अब तक कुल 29 हजार करोड़ से भी अधिक राशि आवंटित की जा चुकी है. लेकिन हालत ये है कि 50 से ज्यादा शहरों के सैकड़ों नाले आज भी गंगा में गिराए जा रहे हैं. गंगा नदी में प्रतिदिन 14 हजार टन ठोस कचरा बहाया जाता है.
पिछले कुछ साल और महीनों के दौरान संसदीय समिति, कैग, एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट सभी गंगा सफाई को लेकर निराशा और चिंता जाहिर कर चुके हैं. कुछ दिन बाद चुनाव आएगा और गंगा मां के स्वनामधन्य धूर्त बेटे भाषणों में फिर से निर्मल गंगा बहाएंगे.
लेकिन असल में गंगा धीरे धीरे विलुप्त होने की ओर बढ़ रही हैं. गंगा सिर्फ धार्मिक महत्व की नदी नहीं है. गंगा भारत की जीवन रेखा है जिसके तट पर कई संस्कृतियां पनपी हैं. गंगा इस वक्त संकट में हैं. पर्यावरण के लिए न सही, तो धार्मिक आस्था के लिए ही सही, पर गंगा को बचाया जाना चाहिए. गंगा पर संकट का मतलब है हमारी सभ्यता और संस्कृति पर संकट!

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