सौमित्र रॉय
आज से 46 साल पहले 25 जून 1975 को आपातकाल लगा था। जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल के लिए माफी मांगी तो लगा कि हमारे इतिहास का एक भयावह काल खत्म हो गया है और अब यह वापस कभी नहीं आएगा।
आज 46 साल बाद यह अहसास हो रहा है कि हम गलत थे। तब का आपातकाल अगर एक ‘झटका’ था तो आज की स्थिति ‘हलाल’ की तरह है, जिसमें लोकतंत्र को हमारी राजव्यवस्था से अलग किया जा रहा है।
उस समय की स्थितियों और अभी की स्थितियों में काफी समानताएं हैं। मोदी ने सत्ता का इतना केंद्रीकरण कर दिया है कि निर्णय ले लिए जाते हैं और संबंधित विभाग के मंत्री को पता भी नहीं होता है।
आपातकाल की तुलना में देखें तो प्रशासनिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और अधिक खत्म हुई है। चुनाव आयोग, सशस्त्र बलों, न्यायपालिका, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक जैसी संस्थाएं राजनीतिक हस्तक्षेप से अपनी स्वतंत्रता के लिए जानी जाती हैं, लेकिन अभी ये मोदी-शाह की जोड़ी के साथ मिलकर उनकी हिंदुत्व की परियोजना के लिए काम करती दिखती हैं।
लोगों को किसी भी तरह देशद्रोह (राजद्रोह) के कानून या अन्य ऐसे कानूनों के तहत उठाया जा सकता है और जिस तरह से मीसा कानून में पक्ष रखने का मौका नहीं मिलता था, वही अब भी हो रहा है।
आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम यानी मीसा (MISA) की तरह ही गैरकानूनी गतिविधियां प्रतिरोधक कानून (UAPA) के प्रावधान भी बेहद व्यापक हैं। आपातकाल के दौरान संजय गांधी के सौंदर्यवादी अधिनायकवाद को मोदी ही आगे बढ़ा रहे हैं।
सेंट्रल विस्टा परियोजना को काफी तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। वह भी ऐसे समय में, जब हजारों लोग स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मर रहे थे। अभी इस तरह के अधिनायकवादी नेतृत्व को ताकत वैचारिक पृष्ठभूमि से मिल रही है। दुर्भाग्य यह है कि अभी ये खत्म होता नहीं दिख रहा।

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