मोहम्मद जाहिद
पार्श्व गायन की बात होगी तो भारत में , मुहम्मद रफी , मुकेश और किशोर कुमार के बिना चर्चा निरर्थक होगी। हालाँकि उसी दौर में मन्ना डे भी थे पर वह “टाइप्ड” हो गये थे , महेन्द्र कपूर भी थे जो मुहम्मद रफी की नकल ही किया करते थे।
मुख्य मुकाबला रफी-मुकेश-किशोर में ही था , मुहम्मद रफी हर एक कलाकार को आवाज़ देते थे , जिसमें दिलीप कुमार , गुरुदत्त , शम्मी कपूर , राजेन्द्र कुमार , देवानंद , अमिताभ बच्चन प्रमुख थे , हालाँकि देव आनंद और अमिताभ बच्चन को बाद में किशोर कुमार अपनी आवाज़ देने लगे।
मुकेश भी बहुत हद तक टाइप्ड थे , सैड सांग में उनका कोई मुकाबला नहीं था , उनके अधिकतर गाने राजकपूर के लिए ही थे। उनके सैडसांग आज भी प्रभावी हैं पर हल्के फुल्के गाने ना होने के कारण वह टाईप्ड हो गये। इसी लिए उनकी प्रतिभा को किशोर और रफी के मुकाबले सीमित मान लिया गया।
किशोर कुमार मल्टी टैलेन्टेड कलाकार थे , जो 80-90 की दशक के कलाकारों के लिए वही गाना गाते थे , इसीलिए वह लोगों की समृतियों में अधिक हैं। वह हल्के मूड और सैडसांग दोनों में पारंगत थे , रोमांटिक गाने भी उनके शानदार थे तो इसका कारण लता के साथ उनके ड्यूट थे।
एक दूसरी वजह लता से मुहम्मद रफी का झगड़ा भी था। इस वजह से दोनों ने साथ गाना बंद कर दिया था और रफी सुमन कल्याणपुर के साथ गाने लगे।
सावरकर की चेली लता कुछ दिन और यूँ ही मुहम्मद रफी के साथ ना गाती तो सुमन कल्याणपुर आज लता की जगह होतीं , कारण स्पष्ट था कि दोनों की आवाज़ एक जैसी थी।
आज भी रफी-सुमन के तमाम गाने लोग रफी-लता का समझ कर ही सुनते हैं। किशोर कुमार ने राजेश खन्ना से लेकर रिषी कपूर तक के लिए गाने गाए और वही रफी मुकेश के बाद तक गाते रहे।
मुकेश का देहांत 27 अगस्त 1976 को हुआ और 31 जुलाई 1980 को रफी का स्वर्गवास हुआ , किशोर कुमार 13 अक्टूबर 1987 को स्वर्ग सिधार गये।
यह तीनों ही गायक लाजवाब थे परन्तु आज के भारत में जो सम्मान मुहम्मद रफी को मिलना चाहिए वह नहीं मिलता , एफएम हो या रियलिटी शो हो या कोई और मंच किशोर कुमार ही छाए रहते हैं।
पर मेरी नजर में “मुहम्मद रफी” इन तीनों में बेस्ट हैं।
केवल उनका एक गाया गीत “ऐ मुहब्बत ज़िन्दाबाद” ही देश के सारे गायकों के गानों पर भारी है। पर नफरत किसी को दबा देती है और किसी को उभार देती है। मुहम्मद रफी को लोग अब लगभग भूल रहे हैं जबकि किशोर को हर मंच से याद कराया जाता है।

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