मोहम्मद जाहिद
राजनीति में मुस्लिम नेताओं से ईमानदार शायद ही कोई हो। जिस पार्टी या नेता के साथ रहे इमानदार रहे वफादार रहे।
आज की राजनीति में जब सत्ता की मलाई चाटने के लिए कोई भी इधर से उधर चला जाता है ऐसे में मुस्लिम नेताओं ने ऐसा अमूमन नहीं किया। जबकि बहुसंख्यकों में ब्राम्हण सबसे तरल नेता है कभी भी कहीं भी चला जाता है , इसके बाद अन्य लोग तरलता में किसी भी पार्टी में सत्ता देखकर सरक जाते हैं। इसके बाद ओबीसी और दलित लोग तरलता लिए होते हैं।
मुसलमान नेता जिसके साथ रहा वफादार रहा , जबतक कि उसे स्वयं पार्टी ने निस्कासित ना कर दिया हो जीवन के अंत तक पार्टी के प्रति वफादार रहा है।
आज़मखान को ही देख लीजिए , तमाम अपमान और आत्याचार के बावजूद समाजवादी पार्टी के प्रति अभी भी वफादार हैं , कोई ब्राम्हण होता तो अब तक योगी जी के चरणों में लोट गया होता।
अतीक अहमद को देख लीजिए , तमाम परेशानियों के बावजूद समाजवादी पार्टी में बने हुए हैं जबकि अखिलेश यादव का उनके प्रति व्यवहार एहसानफरामोशी वाला रहा है।
मुख्तार अंसारी को देख लीजिए , मुहम्मद शहाबुद्दीन तो लालू प्रसाद यादव के प्रति वफादारी के कारण ही मौत को प्राप्त हुए , नितीश कुमार के साथ चले गये होते तो आज भी उनकी हनक बरकरार रहती।
ऐसे ही नसीमुद्दीन सिद्दीकी हों या गुलाम नबी आज़ाद या अहमद पटेल , वफादार ही रहे , नसीमुद्दीन सिद्दिकी तो सनकी अध्यक्ष के कारण निष्कासित हुए वरना उनकी इमानदारी पर अभी भी कोई सवाल नहीं।
ऐसे ही बिहार के मुस्लिम नेता हों या बंगाल के , दिल्ली के मुस्लिम नेता हों या राजस्थान के सब अपनी पार्टी के प्रति वफादार रहे। मध्यप्रदेश हो या कर्नाटक , तेलंगाना हो या आंध्रा प्रदेश , केरल हो या तमिलनाडु , मुस्लिम नेता अपनी पार्टी और अपने नेताओं से गद्दारी करके शायद ही विरोधी दल के साथ गये हों।
भाजपा में ही देख लीजिए , शहनवाज हों या मुख्तार , पार्टी के प्रति इनकी वफादारी औरों से भी अधिक है। फिर भी लोग मुस्लिम नेताओं पर विश्वास नहीं करते।

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