सौमित्र रॉय
लगता है कि नए IT कानून के डर ने सवालों का गला घोंट दिया है। 1975 की इमरजेंसी अगर थोपी गई थी, तो आज इमरजेंसी का पट्टा आपने ख़ुद गले पर बांध लिया है।
पार्टी, व्हाट्सएप फॉरवर्ड, खाने-पीने, घूमने से लेकर कुत्ते-बिल्ली तक की पोस्ट। सिलबट्टा नया है। लगता है इस कायर, कमज़ोर, नपुंसक समाज के लिए कोई मुद्दा ही नहीं बचा।
दूसरी जमात, कुछ सार्थक लिखने वालों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने वाली है, ताकि हम न फंसें। स्कैंडल इनका पसंदीदा विषय है, जिसके जरिये ये जमात मानसिक बलात्कार कर कुंठा मुक्त हो जाती है। दोनों जमातों को मैं नपुंसक मानता हूं। बार-बार सख़्त लहज़े में कहता भी हूं, लेकिन चमड़ी मोटी हो चली है।
बहरहाल, आज महामहिम राष्ट्रपति की प्रेसिडेंशियल ट्रेन कानपुर से गुज़री तो दो जानें गईं। पहले CRPF की गाड़ी से कुचलकर एक बच्चे की तो दूसरी एक महिला की।
आज ही आंदोलनकारी किसानों ने रैली निकालकर ज्ञापनबाज़ी की। ये वही किसान हैं, जिन पर जाम लगाने, यातायात बाधित करने और एम्बुलेंस को रास्ता न देने का आरोप इसी दोगले समाज ने लगाया था।
राष्ट्रपति आम नागरिक नहीं हैं। उन्होंने पीड़ित परिवार से माफी मांगी है। यानी किसी बेकसूर की जान जाए और आप माफी का ट्वीट कर जान छुड़ा लें। बच्चे की ख़बर को दलाल गोदी मीडिया ने दबा दिया है। बच्चे कभी हमारे विमर्श का विषय नहीं रहे।
भारत में जान सस्ती है, क्योंकि हमने ख़ुद ग़ुलामी ओढ़ रखी है। कभी ठाकुर की, कभी राजा की, कभी अंग्रेजों की तो कभी मंत्री-संतरी की। हमने जवाबदेही का अर्थ सीखा ही नहीं। सीखना भी नहीं चाहते, क्योंकि हम ख़ुद पर यक़ीन खो चुके हैं।
हमने बहू-बेटियों को पर्दे में रखा। पितृसत्तात्मक समाज खड़ा किया, जहां 90% से ज़्यादा बलात्कार घरों में अपनी विकृत कुंठा को दबाने के लिए होते हैं। बच्चों को भी मानसिक ग़ुलामी का पट्टा पहना दिया।
आज एक मित्र ने पूछा-हम कहां जा रहे हैं? मैंने जवाब दिया कि किधर जा रहे हैं? सवाल बड़ा नहीं है। सोशल मीडिया से लेकर घर के, बाहर के बजबजाते, बदबू मारते समाज को देखें, जवाब मिल जाएगा।
मोदी ने चुनाव जीतने के लिए देश के सबसे पिछड़े, ग़ुलाम और हिन्दू कट्टरवादी राज्यों में से एक यूपी को स्मार्ट बना दिया। बाहर, सोशल मीडिया का समाज भी कथित रूप से स्मार्ट है। जीन्स-पैंट, कोट-टाई बांधकर कारों के साथ फोटू ठेलने वाला।
असल में आप जितना खुद को इस बेहद घटिया बाजारूपन से जोड़ते हैं, नफ़रत और कुंठा के दलदल में उतना ही धंसते जाते हैं। आपकी मानसिकता चित्रा-अतुल से आगे ही नहीं बढ़ती। उस घरेलू पचड़े में पढ़कर आपको वही नफरती, फितरती खुराक मिलती है, जो बीजेपी की सत्ता रोज़ उपलब्ध कराती है।
ये विकृत समाज कहां जा रहा है?
ये कहीं नहीं जा रहा। इसे गोल-गोल रानी खिलाया जा रहा है।
आपने अपने गले के पट्टे की डोर मदारी को जो थमाई है।
मदारी के बंदर का कोई भविष्य, कोई दिशा है क्या?

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