इब्न ए आदम
2010 के ज़िला पंचायत चुनाव में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार थी , बसपा के 50 के क़रीब अध्यक्ष चुने गए थे जिसमें 28 अध्यक्ष निर्विरोध चुने गए थे । 2012 में विधान सभा चुनाव हुए और 212 विधायकों वाली बसपा केवल 80 विधायक जीत पायी और सत्ता से बाहर हो गयी ।
2015 के ज़िला पंचायत चुनाव में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार थी । सपा के 60 ज़िला पंचायत अध्यक्ष बने जिसमें 36 अध्यक्ष निर्विरोध चुने गए थे । 2017 में विधानसभा चुनाव हुए और 225 सीट वाली सपा 47 विधायक जीतकर विपक्ष में बैठ गयी । 2021 के ज़िला पंचायत चुनाव में प्रचंड बहुमत और एतिहासिक धांधली , गुंडई के बाद भी भाजपा केवल 15 अध्यक्ष निर्विरोध जितवा पायी है ।
ज़िला पंचायत का चुनाव सत्ता का चुनाव होता है । लेकिन प्रदेश ने पहली बार ऐसी नंगाई देखी है कि प्रशासन खुद सदस्यों का अपहरण करके भाजपा को दे रहा है । प्रशासन विपक्ष के नेताओ के घर को छावनी बना रहा है जिससे विपक्ष नामांकन ना करवा पाए । सदस्य उठाने का काम तो पार्टी के नेता , कार्यकर्ता करते थे , प्रशासन उस पर सत्ता के दबाव में मौन रहता था , कल तो प्रशासन खुद ही भाजपा कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहा था ।
अगर आप बारीकी से देखेंगे तो आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि भाजपा के पास इतने कार्यकर्ता और नेता भी नहीं बचे हैं जो प्रशासन की छूट के बाद भी विपक्ष के सदस्यों पर हाथ डाल सकें । भाजपा की ज़मीन उत्तर प्रदेश में खिसक चुकी है ।

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