Zaigham Murtaza
एमआईएम बड़ी ताक़त क्यों नहीं बन पा रही? इसके नेता, कार्यकर्ता ज़मीन पर आंदोलन या मिल्ली काम के बजाय सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने और गाली गलौच में वक़्त ज़ाया कर रहे हैं। पिछले तीन दिन में हर कार्यकर्ता की दीवार पर बीएसपी से गठबंधन की ख़बर है।
आज मायावती कह रही हैं ऐसा कुछ हुआ ही नहीं हमारी तरफ से। मतलब एकतरफा क़यास। इसके अलावा हर चुनाव में पार्टी कार्यकर्ता दूसरे दलों पर गठबंधन का दबाव बनाते हैं यह जानते हुए कि वोटों के लिए उनकी लड़ाई इन्हीं दलों से होनी है। दूसरी बात, गठबंधन समान विचारधारा वाले दलों से होते हैं। जो दल इनकी विचारधारा और ऐजेंडा पर चलते हैं उनसे इनकी नाक की लड़ाई है (एसडीपीआई, पीएफआई, पीस पार्टी, आरयूसी, परचम पार्टी वग़ैरह)।
पिछले सात साल में मिल्ली या क़ौमी मसलों पर इस पार्टी के नेता के बयानों के अलावा कोई जनान्दोलन दिखा दीजिए। सारा दिन वही सौ सवा सौ लोग और उनके सौ डेढ़ सौ हमदर्द सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव और मायावती जितने ही सक्रिय नज़र आते हैं। यह जानते हुए भी ऐसा हो रहा है कि नेता के बयान और सोशल मीडिया की बहस से दो लोग नाराज़ तो हो सकते हैं लेकिन ज़मीन पर उतरे बिना दो लोग जोड़े नहीं जा सकते। सियासत सिर्फ बयानबाज़ी का नाम नहीं है।
सियासी जमात एक वक़्त में तीन काम करती हैं। पहला समस्या की पहचान, दूसरा सत्ता प्रतिष्ठान पर उस समस्या के हल का दबाव बनाना और तीसरे सत्ता संघर्ष में शामिल होना ताकि सत्ता पाकर अपना ऐजेंडा लागू कर सकें। एमआईएम इन तीनों ही मुद्दों पर विफल रही है। पार्टी के नेता और कार्यकर्ता ऐसी जमात से हैं जहां समस्याओं की भरमार है मगर शायद ही कभी उन्हें लेकर कभी किसी आंदोलन की बात की हो।
महज़ बयान या भाषण से सत्ता पर दबाव नहीं बनते। सत्ता जानती है बोलेगा और कुछ नहीं करेगा तो बोल लेने दो, कौन सा कुछ देना है। सत्ता संघर्ष के नाम पर इस पार्टी का ज़ोर सत्ता को चुनौती पर नहीं बल्कि सत्ता विरोधी पार्टियों को हराने पर है। इसकी एक वजह मुसलमान वोटों पर दावेदारी है। यानी उन्हीं पंद्रह फीसदी पर इनकी भी सियासत है जिनके पचास और दावेदार हैं लेकिन पंद्रह फीसदी के लिए भविष्य का ऐजेंडा इनके पास भी नहीं है।
लोगों की सियासत में दिलचस्पी सत्ता में शामिल होने, सत्ता से काम निकालने और सत्ता प्रतिष्ठान से अधिक से अधिक सहूलियतें हासिल करना की वजहों से होती है। इस फ्रंट पर पार्टी नेताओं का विज़न साफ नहीं है। पार्टी बीजेपी के साथ सरकार में शामिल हो नहीं सकती और तमाम विपक्ष को गाली दे देकर कार्यकर्ताओं ने ऐसा माहौल बना दिया है कि उधर भी गुंजाइश ख़त्म।
जब सत्ता में आना ही नहीं है और अपने दम पर सरकार बननी नहीं है तो फिर हश्र कम्यूनिस्ट दलों जैसा क्यों नहीं होगा? याद कीजिए और हिसाब लगाइए, अगर ज्योति बसु पीएम पद न ठुकराते तो वाम दलों की यही हालत होती? सियासत में बने रहने के लिए सत्ता में आने का भरोसा देना होता है चाहे हारते रहो, वरना लोग नहीं सुनते। लोग इतने जागरुक तो हैं कि समझ लें विपक्ष का सांसद सत्ताधारी नगर पंचायत पार्षद से भी गया गुज़रा होता है। लोगों के किस काम का?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *