इब्न ए आदम
कोरोना काल में जब लोगों ने अपने सगे सम्बंधियों को अस्पताल में छोड़ दिया , जब लोगों के पास अपने सम्बंधियों को दफ़नाने / जलाने के लिए पैसे नहीं थे , जब लोगों ने अपने सम्बंधियों की लाशों को गंगा में बहा दिया तब हमारे देश में कई ऐसे फ़रिश्ते भी थे जो बिना धर्म जाति देखे लोगों का अंतिम संस्कार सम्मान पूर्वक कर रहे थे । मुहम्मद ग़िज़ाल सिद्दीक़ी साहब भी ऐसे ही एक फ़रिश्ते हैं ।
बरेली के ग़िज़ाल सिद्दीक़ी साहब पिछले 38 साल से लावारिस लाशों का उनके धर्म के हिसाब से सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कर रहे हैं और अब तक 7000 लाशों का वो अंतिम संस्कार कर चुके हैं ।
कोरोना की दूसरी लहर में लोगों के मरने की तादाद बहुत ज़्यादा थी और लोग बड़े लम्बे समय से बेरोज़गारी से जूझ रहे थे । ऐसे में सिद्दीक़ी साहब उन लोगों के लिए फ़रिश्ता साबित हुए जो पैसे की कमी या किसी दूसरी वजह से अपने सम्बंधियों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार नहीं कर पा रहे थे । रमज़ान के महीने में सिद्दीक़ी साहब ने 385 लोगों को दफ़नाया है और 40 लोगों की चिता को अग्नि दी है ।
काश , उत्तर प्रदेश के हर गाँव , हर क़स्बे , हर शहर में एक ग़िज़ाल सिद्दीक़ी साहब जैसा फ़रिश्ता होता तो किसी की लाश गंगा में तैरती हुई नहीं मिलती और ना ही किसी को मजबूरी में गंगा के किनारे दफ़न किया जाता ।

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